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📅 शनिवार, 13 सितंबर 2026
सच, सरोकार और समाज की आवाज़

एक कस्बा, कई कहानियाँ — जहाँ कभी दंगा नहीं हुआ

asiatimesadmin

By: अशरफ अली बस्तवी

बच्चों ने अपने शिक्षक मेजर इकराम से कक्षा में पूछा, “सर, ‘बागनगर’ का नाम बागनगर क्यों पड़ा?”
उन्होंने बताया कि किसी समय यह इलाका घने बागों की गोद में बसा हुआ था, लेकिन जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई, बाग समाप्त होते चले गए और अब केवल नाम ही बाकी रह गया है।

जी हाँ, हम बात कर रहे हैं बस्ती-महंदावल रोड (बीएमसीटी) पर स्थित कस्बा बागनगर की। यह कस्बा कठनइया नदी के किनारे, बस्ती जिले की सीमा पर बसा हुआ है। समय के साथ “बागनगर” हिंदी में बदलकर “बाघनगर” हो गया, जबकि उर्दू में आज भी “बागनगर” ही लिखा और पढ़ा जाता है। हालांकि बोलचाल में हिंदी-उर्दू दोनों भाषाओं के लोग इसे “बाघनगर” ही कहते हैं।

1997 से पहले तक यह बस्ती जिले का हिस्सा था। उसी वर्ष बहुजन समाज पार्टी की सरकार ने संत कबीर नगर नाम से नया जिला बनाया और बागनगर को उसमें शामिल कर दिया। बस्ती से अलग होने की पीड़ा और संत कबीर नगर से दूरी की भावना के कारण स्थानीय लोगों ने इसका जोरदार विरोध किया। कई महीनों तक आंदोलन चला, लेकिन सरकार के फैसले के आगे जनता की कोशिश सफल नहीं हो सकी।

एक परंपरा के अनुसार, यहाँ सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी के शिष्य बाबा हुंकार का मजार मौजा बलईपुर में स्थित है, जिसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। दूर-दूर तक फैली मोटी दीवारें उसकी ऐतिहासिकता की गवाही देती हैं। हिंदू और मुसलमान दोनों यहाँ अपनी आस्था प्रकट करते दिखाई देते हैं।

इलाके की पहचान हैं यहाँ की शिक्षण संस्थाएँ

इस मुस्लिम बहुल क्षेत्र की सबसे बड़ी पहचान यहाँ के पुराने मदरसे और मकतब हैं। सबसे पुराना मदरसा “कासिमुल उलूम” है, जिसकी स्थापना लगभग 70 वर्ष पहले हुई थी।

इसके अलावा 1970 के दशक में समाजसेवी और राजनीतिक कार्यकर्ता नेता हबीबुर्रहमान ने लगभग 14 बीघा भूमि पर “जनता जूनियर हाई स्कूल” की स्थापना की, जो अब “मुस्लिम इंडस्ट्रियल इंटर कॉलेज” बन चुका है।

1988 के आसपास एक सेवानिवृत्त सैनिक मास्टर सलाहुद्दीन ने क्षेत्र के बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए पहला नर्सरी स्कूल शुरू किया। वहाँ बच्चों को शिक्षा के साथ खेल भावना और प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण भी दिया जाता था। लेकिन 1993 में उनका निधन हो गया।

सन् 2000 तक कई निजी स्कूल खुल चुके थे। लड़कियों की शिक्षा के लिए सामाजिक संस्था “जीवन विकास संस्थान” के अध्यक्ष डॉ. शकील खान ने “ज़हरा गर्ल्स इंटर कॉलेज” की स्थापना की, जो इस क्षेत्र का पहला बालिका इंटर कॉलेज बना।

तनवीर अहमद ने दिलाई नई पहचान 

पूर्व जिला पंचायत सदस्य डॉ. शकील खान के पुत्र तनवीर अहमद ने 2021  में यू.पी.पी.सी.एस.में 13 वी रैंक हासिल एसडीएम पद पर हुये चयनित। इस प्रकार बागनगर को मिला एक युवा प्रशासनिक अधिकारी , जो युवाओं के लिए बना रोल मॉडल .

स्वतंत्रता आंदोलन में भी रहा सक्रिय योगदान

स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि देश की आज़ादी की लड़ाई में भी बागनगर की सक्रिय भूमिका रही है। पास के गाँव पेड़ी से स्वतंत्रता सेनानी निजामुद्दीन साहब का संबंध था।

कहा जाता है कि कस्बे के पास एक बाग में महात्मा गांधी का कार्यक्रम रखा गया था। गांधी जी यहाँ आए भी, लेकिन कार्यक्रम से पहले ही अंग्रेज पुलिस को इसकी सूचना मिल गई। पुलिस ने छापेमारी कर भीड़ को तितर-बितर कर दिया।

बुजुर्ग मोहम्मद खलील बताते हैं कि गांधी जी के अलावा पंडित जवाहरलाल नेहरू भी बैलगाड़ी से इस क्षेत्र में आए थे और कई स्थानों पर लोगों को संबोधित किया था।

बागनगर की पत्रकारिता में पहचान

बागनगर को अखबारी दुनिया में पहचान दिलाने वाले पहले पत्रकार नफीस अहमद थे। उन्होंने “राष्ट्रीय सहारा हिंदी” गोरखपुर में रिपोर्टिंग शुरू करते समय “बाघनगर” डेटलाइन शुरू कराई।

इसी के साथ “राष्ट्रीय सहारा उर्दू” में अशरफ अली बस्तवी ने 2002 में बागनगर डेटलाइन से रिपोर्टिंग शुरू की। नफीस अहमद ने लगभग 25 वर्षों तक निडर और निष्पक्ष पत्रकारिता की। आज वे इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी शुरू की हुई डेटलाइन आज भी जारी है।

अशरफ अली बस्तवी 2006 में दिल्ली आ गए और आज प्रिंट मीडिया के साथ-साथ रेडियो, दूरदर्शन और वेब पत्रकारिता में सक्रिय हैं।

बागनगर के प्रसिद्ध चिकित्सक

बागनगर का उल्लेख हो और डॉ. मोहम्मद तारिक, डॉ. समीउल्लाह, डॉ. अबुल कलाम और हकीम मुईनुद्दीन होम्योपैथी वाले का नाम न आए, तो यह नाइंसाफी होगी।

डॉ. मोहम्मद तारिक ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीयूएमएस की डिग्री लेकर शहर छोड़ ग्रामीण क्षेत्र में सेवा शुरू की। क्षेत्र का लगभग हर व्यक्ति उन्हें जानता है।

डॉ. समीउल्लाह लगभग 45 वर्ष पहले गोंडा से यहाँ आए थे। डॉ. अबुल कलाम बलईपुर गाँव के रहने वाले थे और हकीम मुईनुद्दीन होम्योपैथिक चिकित्सक थे। इन चिकित्सकों की वजह से बागनगर लंबे समय तक एक प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र बना रहा।

जब डकैतों ने कस्बे पर हमला किया

बुजुर्ग मोहम्मद खलील बताते हैं कि 1970 के दशक में एक रात हथियारबंद डकैतों ने बागनगर बाजार पर हमला कर दिया। कई दुकानों को लूट लिया गया और एक व्यापारी की हत्या हो गई।

डकैती से दो सप्ताह पहले कुछ अजनबी लोग बाजार में घूम-घूमकर दुकानों के साइनबोर्ड नोट करते दिखाई दिए थे, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया।

बाद में कस्बा फिर से आबाद हुआ। यहाँ शनिवार और मंगलवार को साप्ताहिक बाजार लगता है। कभी यह बाजार बहुत बड़ा हुआ करता था, लेकिन अब आसपास छोटी-छोटी मार्केट विकसित हो जाने से इसका दायरा सीमित हो गया है।

1965 में ही पहुँच गई थी बिजली और सड़क

कस्बे में 1965 में ही बिजली आ गई थी और यहाँ विद्युत सब-स्टेशन भी स्थापित हो चुका था, जहाँ से पूरे क्षेत्र की बिजली व्यवस्था नियंत्रित होती थी।

लेकिन लगातार बिजली कटौती के कारण लोग इसका पूरा लाभ नहीं उठा सके। बिजली आधारित व्यापारिक गतिविधियाँ विकसित नहीं हो पाईं।

यहाँ के बड़े किसान गन्ने की खेती को प्राथमिकता देते हैं, जबकि मध्यम किसान धान, गेहूँ और सरसों की खेती करते हैं। कभी यहाँ बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती थी। इसी कारण बस्ती शुगर मिल ने किसानों की सुविधा के लिए बस्ती-महंदावल रोड अपने खर्च पर बनवाई थी ताकि गन्ना आसानी से मिल तक पहुँच सके।

समय के साथ बढ़ती आबादी, सीमित संसाधनों और रोजगार के कम अवसरों के कारण यहाँ के लोग बड़ी संख्या में मुंबई और गुजरात की ओर गए और व्यापार में अपनी पहचान बनाई। कुछ लोग खाड़ी देशों में भी गए।

राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र

1990 के दशक में बागनगर कांशीराम की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था। बहुजन समाज पार्टी की कई गतिविधियाँ यहीं से संचालित होती थीं, जिनमें मोहम्मद हारून साहिल और मास्टर सलाहुद्दीन का नाम प्रमुख है।

बाद में डॉ. मसूद द्वारा “नेशनल लोक तांत्रिक पार्टी” के गठन के बाद भी यहाँ राजनीतिक गतिविधियाँ तेज रहीं। 1997 में कुछ युवाओं ने पार्टी का यूथ विंग भी बनाया।

कभी नहीं हुआ सांप्रदायिक दंगा

इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मुस्लिम बहुल होने के बावजूद आसपास बड़ी संख्या में पिछड़े हिंदू समुदाय के लोग रहते हैं, लेकिन इतिहास में कभी कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ।

2004 में जरूर कुछ असामाजिक तत्वों ने दंगा भड़काने की कोशिश की। एक दलित व्यक्ति का बैल चोरी कर अफवाह फैलाई गई कि मुसलमानों ने उसे काट दिया है। मामला प्रशासन तक पहुँचा और तनाव बढ़ गया।

बताया जाता है कि तत्कालीन डीआईजी त्रिपाठी ने विवादित बयान दिया, लेकिन स्थानीय लोगों की समझदारी और संयम से दंगा टल गया। बाद में सच्चाई सामने आई और संबंधित अधिकारी का तबादला कर दिया गया।

बागनगर की प्रमुख हस्तियाँ और व्यापारी

मिठाई प्रेमी आज भी अशर्फीलाल और गंगाराम के सोहन हलवे को याद करते हैं, जबकि चाय के शौकीनों को मेवालाल और मुल्लाजी चाय वाले याद आते हैं।

धार्मिक मामलों में बड़े मौलवी साहब मौलाना मोहम्मद इस्माइल का नाम सम्मान से लिया जाता है। वे लंबे समय तक मदरसा कासिमुल उलूम के नाज़िम रहे।

राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों में मोहम्मद हारून साहिल, पूर्व ब्लॉक प्रमुख शब्बीर अहमद, पूर्व जिला पंचायत सदस्य डॉ. शकील खान, समाजवादी पार्टी के मोहम्मद मारूफ और एआईएमआईएम के जिला महासचिव वसीम खान वसीम प्रमुख हैं।

साहित्य और पत्रकारिता से जुड़े लोगों में डॉ. तारिक रशीद उस्मानी, इसरार राज़ी, उर्दू चैनल मुंबई के संपादक कमर सिद्दीकी, कवि एवं राजनेता वसीम खान वसीम तथा राष्ट्रीय सहारा हिंदी के संवाददाता परवेज दुर्रानी उल्लेखनीय हैं.


लेखक एशिया टाइम्स के मुख्य संपादक हैं 

Cntact : 9891568632


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